Exclusive Interview: क्या सस्ता इंश्योरेंस लें तो काम नहीं चलेगा? प्रोबस सीईओ ने बताई बीमा की पूरी बात

मुझे लगता है कि इंश्योरेंस अब ज्‍यादा प्रोएक्टिव बनेगा। कंपनियां सिर्फ मुसीबत आने पर आर्थिक मदद ही नहीं देंगी, बल्कि और हेल्थ चेक-अप्स और वेलनेस सपोर्ट को पॉलिसी से जोड़ेंगी, ताकि लोग रोजमर्रा की जिंदगी में बीमार ही न पड़ें और पूरी तरह स्वस्थ रहें।’ यह कहना है प्रोबस की सीईओ और प्रिंसिपल ऑफिसर तृप्ति बालासुब्रमण्यिम का। मिंट हिंदी को दिए एक्सक्लूसिव इंटरव्यू में उन्होंने इंश्योरेंस सेक्टर में आ रहे बदलावों, ग्राहकों में जागरूकता समेत इंडस्ट्री से जुड़े अन्य प्रमुख मुद्दों पर अपनी राय रखी है। आइए जानते हैं कि बालासुब्रमण्यिम ने किस सवाल पर क्या कहा।

प्रश्न: आप भारत में हेल्थ और लाइफ इंश्योरेंस इंडस्ट्री की मौजूदा स्थिति को कैसे देखते हैं? कौन से मेन ट्रेंड्स इसके भविष्य को नया आकार दे रहे हैं?

तृप्ति बालासुब्रमण्यिम: यह इंडस्ट्री अभी बहुत तेजी से परिपक्‍व हो रही है, और इसकी सबसे बड़ी वजह आज का समझदार और जागरूक ग्राहक है। पहले हेल्थ इंश्योरेंस को लोग एक वैकल्पिक सुविधा की तरह देखते थे। लेकिन आज परिवार इसे सबसे जरूरी सुरक्षा मानते हैं। जिस तरह से पिछले कुछ सालों में मेडिकल इमरजेंसी के समय अस्पतालों के बिल आसमान छूने लगे हैं, उसने पूरे देश की आंखें खोल दी हैं।

इसी तरह, लाइफ इंश्योरेंस की बात करें तो लोग अब इसे सिर्फ टैक्स बचाने का जरिया मानने की गलती नहीं कर रहे हैं। अब लोग इसका असली मकसद समझ रहे हैं, उन लोगों का भविष्य सुरक्षित करना जो उन पर निर्भर हैं। इसके साथ ही देश में डिजिटल लहर भी तेजी से चल रही है। अब ग्राहक ऑनलाइन इंश्योरेंस खरीदने से झिझकते नहीं हैं, बल्कि वे खुद रिसर्च करके सही प्लान चुनना पसंद करते हैं। आने वाले समय में वही कंपनियां आगे निकलेंगी जो पर्सनलाइजेशन को सही तरीके से लागू करेंगी, क्लेम प्रोसेस को बेहद आसान और तेज बनाएंगी, और ग्राहकों को लगातार जागरूक करती रहेंगी।

प्रश्न: उपभोक्ता के सामने सही इंश्योरेंस पॉलिसी चुनने में सबसे बड़ी चुनौतियां क्या हैं, और वे बेहतर फैसले कैसे ले सकते हैं?

तृप्ति बालासुब्रमण्यिम: आजकल बाजार में ढेरों विकल्प हैं। यदि आप ऑनलाइन हेल्थ इंश्योरेंस ढूंढने जाते हैं, तो आपके सामने ढेरों ऑप्शंस आ जाते हैं। इसी इन्फॉर्मेशन ओवरलोड के कारण लोग इतने उलझ जाते हैं कि वो सबसे सस्ती पॉलिसी खरीदने का खतरनाक शॉर्टकट चुन लेते हैं। वो यह देखना भूल जाते हैं कि उसमें क्या-क्या एक्‍सक्‍लूडेड है, उसका वेटिंग पीरियड कितना है, या सब लिमिट्स क्या हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है जैसे आप एक्सीडेंट से बचने के लिए सस्ता हेलमेट खरीद लें, बिना यह देखे कि वह आपकी जान बचा भी पाएगा या नहीं।

एक और खतरा है अंडर-इंश्योरेंस। लोग दो या तीन लाख रुपये का कवर लेकर सोचते हैं कि वे सुरक्षित हैं। वे इस सच्चाई से अनजान हैं कि आज एक बड़ी सर्जरी का खर्च इससे दोगुना हो सकता है। हमारी सलाह बहुत सिंपल है कि सिर्फ प्राइस टैग मत देखिए, पॉलिसी की बारीकियां जैसे एक्स्क्लूजन और वेटिंग पीरियड ध्यान से पढ़ें। किसी भरोसेमंद एडवाइजर या ब्रोकर की मदद लें जो आपकी लाइफस्टाइल के हिसाब से सही प्लान बता सके। हमेशा पॉलिसी साइन करने से पहले बीमा कंपनी के वास्‍तविक दावा निपटान का ट्रैक रिकॉर्ड जरूर जांचें।

प्रश्न: डिजिटल दौर में ग्राहकों का व्यवहार कैसे बदला है, और इंश्योरेंस इंडस्ट्री के लिए इसके क्या मायने हैं?

तृप्ति बालासुब्रमण्यिम: अब ग्राहक एजेंट का इंतजार नहीं करता, वह खुद अपनी रिसर्च करके आता है। कुछ साल पहले तक क्या होता था? एक एजेंट घर आता था, प्लान समझाता था और वही जानकारी का इकलौता जरिया होता था। आज जब ग्राहक किसी एडवाइजर से बात करता है, उससे पहले ही वह ऑनलाइन रेट्स की तुलना कर चुका होता है, रिव्यूज पढ़ चुका होता है और कुछ ऑप्शंस शॉर्टलिस्ट कर चुका होता है। वे अपनी मर्जी और स्पीड से खरीदना चाहते हैं, बिना किसी दबाव के।

ग्राहकों का धैर्य अब लगभग खत्म हो चुका है। अगर ऑनलाइन फॉर्म भरने या ऑनबोर्डिंग में ज्यादा टाइम लगा या फालतू कागजात मांगे गए, तो ग्राहक तुरंत पेज बंद करके दूसरी जगह चला जाएगा। कंपनियों को ‘कस्टमर की सहूलियत’ के हिसाब से ढलना होगा। अगर आप एक आसान डिजिटल प्रोसेस और तुरंत एक्सपर्ट सपोर्ट नहीं देंगे, तो आप बहुत जल्दी मार्केट से बाहर हो जाएंगे।

प्रश्न: भारत में इंश्योरेंस की पहुंच बढ़ाने में जागरूकता और वित्तीय साक्षरता की क्या भूमिका है?

तृप्ति बालासुब्रमण्यिम: हमारा साफ मानना है कि वित्तीय साक्षरता किसी भी प्रोडक्ट की कीमत या डिजाइन से कहीं ज्यादा मायने रखती है। अगर कोई इंसान यही नहीं समझता कि उसे इंश्योरेंस की जरूरत क्यों है, तो प्रोडक्ट चाहे कितना भी सस्ता या फीचर्स से भरा हो, कोई फर्क नहीं पड़ता। आज भी बहुत से लोगों को यह अहसास ही नहीं है कि उनकी कंपनी से मिलने वाला बेसिक हेल्थ कवर काफी नहीं है। वे यह भी नहीं समझते कि एक मजबूत लाइफ इंश्योरेंस प्लान पूरे परिवार की फाइनेंशियल प्लानिंग की नींव होता है।

जब यह बुनियादी समझ नहीं होती, तो इंश्योरेंस एक सुरक्षा चक्र की जगह ‘बोझ या नुकसान’ महसूस होने लगता है। यही वजह है कि लोग एक-दो साल बाद अपनी पॉलिसी बंद कर देते हैं। लेकिन जब ग्राहक जागरूक होता है, तो वह इंश्योरेंस को कोई एक बार का सौदा नहीं, बल्कि अपनी पूरी संपत्ति की ढाल समझता है। इसीलिए हम प्रोबस में आसान भाषा में जानकारी देने और सही सलाह देने पर बहुत ध्यान देते हैं। जब कोई ग्राहक यह समझ जाता है कि वह पैसा कहां लगा रहा है और यह उसके परिवार के लिए क्यों जरूरी है, तो वह सिर्फ खुद कवर नहीं रहता, बल्कि अपने दोस्तों और रिश्तेदारों को भी इंश्योरेंस लेने के लिए प्रेरित करता है।

प्रश्न: पूरे भारत में ग्राहकों के बीच इंश्योरेंस के प्रति जागरूकता बढ़ाने और बिजनेस ग्रोथ के लिए प्रोबस के मुख्य फोकस एरिया कौन से हैं?

तृप्ति बालासुब्रमण्यिम: अगर मुझे हमारी पूरी ग्रोथ स्ट्रैटेजी को एक शब्द में समेटना हो, तो वो शब्द है- जागरूकता। भारत में लंबे समय से इंश्योरेंस को एक सुरक्षा कवच मानने के बजाय, सिर्फ टैक्स बचाने की मजबूरी या एक फालतू खर्च के रूप में देखा गया है। इस सोच को बदलना ही हमारा सबसे पहला काम है। हम इसे आसान बनाने के लिए कठिन बातों को छोटे-छोटे, सरल कंटेंट के जरिए समझा रहे हैं और जमीन पर जाकर लोगों से बिना किसी दबाव के सीधी बातचीत कर रहे हैं।

दूसरी बात, हम बड़े मेट्रो शहरों से बहुत आगे की सोच रहे हैं। भारतीय इंश्योरेंस का असली भविष्य टियर 2, टियर 3 शहरों और ग्रामीण इलाकों में छुपा है। ये वो जगहें हैं जहां अचानक आई कोई मेडिकल इमरजेंसी किसी परिवार की जिंदगीभर की कमाई को कुछ ही दिनों में खत्म कर सकती है। इसलिए, हम अपने पार्टनर्स के साथ मिलकर ऐसे प्रोडक्ट्स ला रहे हैं जो छोटे शहरों और गांवों के परिवारों की जेब और उनकी खास जरूरतों के हिसाब से सही बैठें, न कि उन पर बने-बनाए, एक-जैसे प्लान थोप रहे हैं।

प्रश्न: इंश्योरेंस सेक्टर बदल रहा है। आपके अनुसार आने वाले समय में कौन से नए बदलाव या इनोवेशन ग्राहकों पर सबसे बड़ा असर डालेंगे?

तृप्ति बालासुब्रमण्यिम: सबसे बड़ा बदलाव पर्सनलाइजेशन से आएगा और यह सबसे बड़ा गेम चेंजर बनने जा रहा है। अब वे दिन गए जब सबके लिए एक जैसा प्लान होता था। अब हम तेजी से पे-ऐज-यू-यूज (जितना इस्तेमाल, उतना प्रीमियम) और लाइफस्टाइल के हिसाब से तैयार किए गए प्लान्स की तरफ बढ़ रहे हैं।

दूसरा सबसे बड़ा बदलाव क्लेम सेटलमेंट की प्रक्रिया में होगा। किसी भी इंश्योरेंस की असली परीक्षा तभी होती है जब आपको उसकी जरूरत पड़ती है। नई टेक्नोलॉजी और ऑटोमेटेड प्रोसेस की मदद से आने वाले समय में तुरंत और कैशलेस क्लेम सेटलमेंट बहुत सामान्य हो जाएगा। इससे अस्पताल से डिस्चार्ज होते वक्त परिवारों को होने वाला तनाव काफी हद तक खत्म हो जाएगा।

और आखिरी बात, मुझे लगता है कि इंश्योरेंस अब ज्‍यादा प्रोएक्टिव बनेगा। यानी कंपनियां सिर्फ मुसीबत आने पर आर्थिक मदद ही नहीं देंगी, बल्कि और हेल्थ चेक-अप्स और वेलनेस सपोर्ट को पॉलिसी से जोड़ेंगी, ताकि लोग रोजमर्रा की जिंदगी में बीमार ही न पड़ें और पूरी तरह स्वस्थ रहें।

प्रश्न: आज जब सबकुछ डिजिटल हो रहा है तो प्रोबस ने इंश्योरेंस ग्राहकों की जरूरतों और उम्मीदों के हिसाब से खुद को कैसे ढाला है?

तृप्ति बालासुब्रमण्यिम: सच कहूं तो, सबसे बड़ा बदलाव हमारी टेक्नोलॉजी में नहीं, हमारी सोच में आया है। हमने एक पारंपरिक इंश्योरेंस ब्रोकर के रूप में शुरुआत की थी, लेकिन आज हम खुद को एक टेक-फर्स्ट एडवाइजरी पार्टनर के रूप में देखते हैं। आजकल हम जिस तरह से चीजें खरीदते हैं, उसे ही देख लीजिए, खाना हो, कपड़े हों या कैब बुक करनी हो, हम चाहते हैं कि सब कुछ तीन क्लिक में हो जाए। इंश्योरेंस ग्राहक भी अब वैसी ही आसान डिजिटल सुविधा चाहते हैं। वे बिना कागजी कार्रवाई के चक्कर में पड़े तुरंत तुलना करना, क्लिक करना और पॉलिसी खरीदना चाहते हैं।

लेकिन हमें शुरुआत में ही एक बहुत अहम बात समझ आ गई थी, आप हर मुसीबत का हल एल्गोरिदम (ऑटोमेशन) से नहीं निकाल सकते। जब परिवार का कोई सदस्य अस्पताल में भर्ती होता है, तो उस वक्त कोई चैटबॉट से बात नहीं करना चाहता। तब लोग एक इंसान की आवाज सुनना चाहते हैं जो कहे, ‘आप चिंता मत कीजिए, हम सब संभाल लेंगे।’

इसलिए, हमारी रणनीति हाइब्रिड यानी दोनों का मिला-जुला रूप है। हम टेक्नोलॉजी का इस्‍तेमाल तेज गति और सुविधा के लिए करते हैं जबकि इंसानी सलाह उन पलों के लिए है जहां सहानुभूति और भरोसे की जरूरत होती है। इसके अलावा, हमने भारी-भरकम कॉर्पोरेट भाषा को पूरी तरह से हटाने का फैसला किया। हम पॉलिसी को बिल्कुल वैसे ही समझाते हैं जैसे कोई दोस्त चाय की चुस्की लेते हुए दूसरे दोस्त को समझाता है। डिजिटल आसानी और इंसानी भरोसे का यही संगम आज का ग्राहक ढूंढ रहा है।

Share this article